क्या पूजा करते समय जूते उतारना जरूरी है? जानें सनातन परंपरा में इसके पीछे की भावना
हिंदू धर्म में पूजा-पाठ सिर्फ एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि आत्मा की शुद्धता और आस्था का प्रतीक माना गया है. जब भी कोई व्यक्ति भगवान के सामने जाता है, तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह तन और मन से पूरी तरह साफ और विनम्र हो. ऐसे में एक सवाल अक्सर उठता है. क्या चप्पल या जूते पहनकर पूजा करना गलत है? क्या ऐसा करने से पूजा का असर घटता है या ईश्वर का अपमान होता है? यह केवल एक सामाजिक नियम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और भावना से जुड़ा विषय है, जिसे समझना जरूरी है. आइए जानते हैं कि शास्त्र, संस्कृति और व्यवहार इस बारे में क्या कहते हैं. इस बारे में बता रहे हैं भोपाल स्थित ज्योतिषाचार्य रवि पाराशर.
चप्पल-जूते पहनकर पूजा: क्या कहते हैं धार्मिक ग्रंथ?
सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में पूजा को बेहद पवित्र और ध्यानयुक्त प्रक्रिया बताया गया है. मनुस्मृति, गरुड़ पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में लिखा गया है कि पूजा से पहले व्यक्ति को नहाना चाहिए, साफ कपड़े पहनने चाहिए और जूते-चप्पल को बाहर उतारने चाहिए. इसका सीधा अर्थ है कि जूते पहनकर पूजा करना भगवान के सामने अशुद्ध अवस्था में जाने जैसा है, जो सही नहीं माना जाता है. ग्रंथों में ये बातें नियम के तौर पर नहीं, बल्कि भक्ति और सम्मान के भाव से जोड़ी गई हैं. जूते-चप्पल पहनकर पूजा करना किसी तरह की सजा योग्य गलती तो नहीं, लेकिन इससे व्यक्ति की आस्था और समझ पर सवाल उठ सकता है.
परंपरा और संस्कृति में इसका क्या महत्व है?
भारत में मंदिरों, आश्रमों और यहां तक कि घरों के पूजा स्थलों में भी जूते पहनकर प्रवेश करना सामान्य रूप से वर्जित होता है. यह नियम केवल सफाई के लिए नहीं, बल्कि विनम्रता और समर्पण के प्रतीक के तौर पर माना जाता है. जब हम अपने जूते बाहर उतारते हैं, तो यह संकेत देता है कि हम अपने घमंड, सांसारिक सोच और अहंकार को छोड़कर भगवान के चरणों में आए हैं. नंगे पांव चलना एक तरह से नम्रता और श्रद्धा को दर्शाता है, जिससे मन पूरी तरह ईश्वर की ओर केंद्रित हो पाता है.
क्या जूते पहनकर पूजा करना पाप है?
शास्त्रों में कहीं भी इसे पाप नहीं कहा गया है, लेकिन इसे सही नहीं माना गया है. पूजा एक ऐसा समय होता है जब व्यक्ति को अपने भीतर की भावनाओं को भगवान के सामने रखना होता है. उस समय अगर कोई व्यक्ति चप्पल या जूते पहनकर पूजा करता है, तो यह न सिर्फ पूजा की पवित्रता को कम करता है, बल्कि ईश्वर के प्रति अनादर जैसा भी माना जा सकता है.

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