शहीदों को अनोखी श्रद्धांजलि: टैटूमैन का खामोश मिशन बना चर्चा का विषय
इंदौर: देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले जवानों को सम्मान देने के लिए कोई क्या-क्या कर सकता है, इसका जीवंत उदाहरण हैं दिल्ली-एनसीआर निवासी आर्किटेक्ट पंडित अभिषेक गौतम। इन्होंने अपने शरीर पर कारगिल युद्ध सहित अन्य सैन्य अभियानों में शहीद हुए 636 जवानों के नाम का टैटू बनवा लिया है। खुद को चलता-फिरता वॉर मेमोरियल बना लिया है, ताकि देश के कोने-कोने में वीर शहीदों की स्मृति हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहे। इंदौर पहुंचे अभिषेक गौतम ने बताया कि वह एक आर्किटेक्ट हैं। देश भर में घूमते रहते हैं। वर्ष 2015 में वह पहली बार कारगिल और लेह-लद्दाख की चोटियों पर गए थे। वहां कारगिल वॉर मेमोरियल को देखकर उन्हें लगा कि यह स्थान किसी मंदिर से कम नहीं है। उनके अनुसार जो सबसे बड़ा मंदिर है, वह कारगिल वॉर मेमोरियल है। वहां की आत्माएं पूजनीय हैं और मैं उन्हें अपना शरीर समर्पित करना चाहता था।
बेसमेंट में छिपकर 11 दिनों तक बनवाया
शहीदों के नाम शरीर पर गुदवाने का निर्णय आसान नहीं था। अभिषेक ने बताया कि इस निर्णय के पीछे एक साल की तैयारी थी। जैसे टैटू बनवाने के लिए स्थान ढूंढ़ना, शरीर को छुपाकर रखना और इस पूरे मिशन को परिवार से भी गुप्त रखना। उन्होंने अपने मित्र के ऑफिस के बेसमेंट में लगातार 11 दिनों तक टैटू बनवाए। शुरुआती दौर में उन्होंने 444 नाम गुदवाए, बाद में कारगिल मेमोरियल से बाकी नाम जुटाए और उन्हें भी जोड़ लिया।
11 महापुरुषों की फोटो भी बनवाई
अभिषेक ने बताया कि उनके शरीर पर न केवल 636 शहीदों के नाम हैं, बल्कि देश के 11 महापुरुषों के चित्र भी हैं। इनमें चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी और गुरु गोविंद सिंह जैसे नाम शामिल हैं। इन महान आत्माओं से उन्हें जीवन में प्रेरणा मिली है।
8 सालों में 700 से अधिक परिवारों से मिले
उन्होंने अपने मिशन के बारे में बताया कि पिछले 8 वर्षों में वे 700 से अधिक शहीद परिवारों से मिल चुके हैं। जब वे किसी परिवार से मिलते हैं, तो उनके परिजन मान लेते हैं कि अभिषेक उनके बेटे या पति का नाम पहले ही गुदवा चुके होंगे और जब वे अपने शरीर पर वह नाम दिखाते हैं, तो परिजनों की आंखों में गर्व और श्रद्धा छलक उठती है।
हर सैनिक के घर से लाते हैं मिट्टी
अभिषेक केवल नाम ही नहीं जोड़ते, वे हर घर से कुछ पवित्र स्मृति भी लेकर जाते हैं। जैसे उस वीर सैनिक के आंगन की मिट्टी। उनका मानना है कि वह मिट्टी ही उन्हें भारत के हर कोने में सुरक्षा देती है। उन्होंने कारगिल वॉर मेमोरियल में भी उस मिट्टी को स्थापित किया है।
कैप्टन मनोज पांडेय से हैं प्रभावित
उन्होंने विशेष रूप से कैप्टन मनोज कुमार पांडे की वीरता को याद करते हुए कहा कि एक साधारण परिवार से आने वाले युवा ने अपनी कड़ी मेहनत से सैनिक स्कूल और फिर एनडीए का सफर तय किया। और जब उनसे पूछा गया कि वे सेना में क्यों आना चाहते हैं, तो उनका जवाब था परमवीर चक्र प्राप्त करने के लिए। उनका कहना है कि वह अभी भी अधूरे हैं, और जब तक वह हर वीर सैनिक के परिवार से नहीं मिल जाते, तब तक यह यात्रा जारी रहेगी।

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