गांववाले मानते हैं कि इस परंपरा से दूर रहती हैं बीमारियां
जबलपुर। महामारी से निजात पाने के लिए दशकों पहले शुरू है एक परंपरा आज भी बखूबी निभाई जा रही है. जबलपुर के पनागर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम बघोड़ा में साल का एक दिन ऐसा होता है जब पूरा का पूरा गांव घर के बाहर एक खेत में आकर खाना बनाता है और उस दिन गांव के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता. मान्यता है कि ऐसा करने से गांव में कोई महामारी नहीं आती है हालांकि आज के दौर में महामारी खत्म हो चुकी है. आधुनिक चिकित्सा प्रणाली आ गई है गांव -गांव स्वास्थ्य केंद्र खुल चुके हैं लेकिन इसके बावजूद भी ग्रामीण की मान्यता आज भी जिंदा है।
ग्रामीण एक साथ खाना खाते हैं
दरअसल, पनागर तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम बाघोड़ा में ग्रामीणों का मानना है की वैशाख महीने के पहले मंगलवार को घर में खाना नहीं बनने से महामारी नहीं आती है और यह प्रथा आज भी ग्रामीणों ने जीवित रखी है. इस दिन गांव के महिलाएं अपने पूरे परिवार के साथ घर के बाहर आती है अपने साथ खाना बनाने का पूरा सामान लेकर आती है और खेत में जाकर चूल्हे पर खाना बनाती हैं. खाने में भी महिलाएं गक्कड़ भरता और चटनी बनती है जिसे फिर पूरा गांव एक साथ बैठकर खाता है।
संत के कहने पर शुरू की परंपरा
ग्रामीणों का कहना है की दशकों पहले गांव में हैजा बीमारी फैल गई थी. गांव में ही कई ग्रामीणों की मौत हो गई जिसमें बच्चे बुजुर्ग महिलाएं शामिल थीं. गांव में इस कदर दहशत फैली कि लोगों ने गांव छोड़ना शुरू कर दिया गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उन दिनों गांव में एक संत आए और उन्होंने गांव के इन हालातों को देखकर ग्रामीणों को पूजा पाठ करने की सलाह दी. संत ने कहा कि अगर गांव के बाहर खाना बनाया जाए और घर के अंदर दोनों वक्त का चूल्हा ना जलाया जाए तो महामारी से निजात मिल सकती है।
संत के बताए उपाय को पूरे गांव ने अपना लिया ग्रामीणों ने यह तय कर लिया कि वैशाख के पहले मंगलवार को किसी के भी घर में चूल्हा नहीं जलेगा और सब एक साथ आकर गांव के बाहर खाना बनाएंगे. इस उपाय के करने के बाद गांव में महामारी का दौर खत्म हो गया और फिर कभी कोई बीमारी गांव में नहीं फैली और उस दिन के बाद से ही गांव की यह परंपरा आज भी चली आ रही है।
दशकों बाद भी निभायी जा रही परंपरा
दशकों को बीत गए लेकिन ग्रामीण आज भी अपने बुजुर्गों की परंपरा को निभा रहे हैं. शादी विवाह हो या फिर कोई भी मांगलिक कार्य अगर वैशाख महीने के पहले मंगलवार में पड़ जाता है तो पूरा परिवार और गांव-गांव के बाहर आकर ही खाना बनाते हैं. लोग इस मंगलवार को बुढ़वा मंगल के तौर पर मानते हैं।
ग्रामीण त्योहार की तरह मना रहे
अब इसे आस्था कहे अंधविश्वास कहें या फिर बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई परंपरा लेकिन आधुनिक भारत में आज भी ग्रामीणों में ऐसी परंपराएं जीवित हैं. जिसका निर्वहन आज की युवा पीढ़ी भी कर रही है हालांकि महामारी का दौर अब खत्म हो चुका है. घरों घर इलाज हो रहा है लेकिन फिर भी ग्रामीण अब इसे एक त्यौहार की तरह मानते हैं और आगे भी मानते रहेंगे।

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