सबरीमाला सुनवाई में बड़ा सवाल, क्या स्पर्श से अपवित्र होते हैं देवता?
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों धर्म और संवैधानिक अधिकारों के बीच की बारीक लकीर को लेकर एक ऐतिहासिक कानूनी बहस चल रही है। सबरीमाला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े 'धर्म बनाम कानून' के मुद्दों पर नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। मंगलवार को छठे दिन की कार्यवाही के दौरान कोर्ट ने आस्था और छुआछूत जैसी परंपराओं पर कड़े सवाल दागे।
प्रमुख कानूनी बिंदु और कोर्ट की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत अधिकारों के संतुलन को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की:
पवित्रता बनाम संवैधानिक अधिकार: पीठ ने सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी के पक्ष से पूछा कि क्या किसी भक्त द्वारा मूर्ति को छूना ईश्वर का अपमान माना जा सकता है? कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि क्या संविधान उस भक्त की रक्षा नहीं करेगा, जिसे केवल उसके जन्म या वंश के आधार पर देवता के स्पर्श से वंचित कर दिया जाता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचर्य की दलील: मंदिर के पक्षकार वकील वी. गिरी ने तर्क दिया कि भगवान अयप्पा 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' हैं और वहां की परंपराएं देवता के इसी स्वरूप के अनुरूप हैं। उन्होंने दलील दी कि किसी भी मंदिर के रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं और पूजा की विधि देवता की विशेषताओं के विपरीत नहीं हो सकती।
आर्टिकल-25 का हवाला: वकील ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत पूजा का अधिकार व्यक्ति की अपनी निजी आस्था और परंपराओं के पालन से जुड़ा है।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में न्यायपालिका की भूमिका को लेकर एक बहुत ही स्पष्ट और सख्त संदेश दिया है:
"यदि राज्य सामाजिक सुधार या जनहित का हवाला देकर किसी धार्मिक रिवाज पर रोक लगाता है, तो कोर्ट को उसकी जांच करने का पूर्ण अधिकार है। हम यह नहीं कह सकते कि अदालतों के पास इस पर सवाल उठाने की शक्ति नहीं है।"
कोर्ट ने माना कि यद्यपि न्यायिक समीक्षा की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन धर्म की आड़ में होने वाली प्रथाओं की संवैधानिक वैधता को परखना अदालत का कर्तव्य है। यह सुनवाई अब उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां यह तय होगा कि क्या सदियों पुरानी परंपराएं आधुनिक संवैधानिक अधिकारों (समानता का अधिकार) से ऊपर हो सकती हैं या नहीं।

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