नेपाल में बालेन शाह के हनीमून पीरियड में ही शुरु हो गया व्यापक जनआक्रोश.....सड़क पर लोग
काठमांडू। नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के मात्र एक माह के भीतर ही व्यापक जनआक्रोश देखने को मिल रहा है। काठमांडू के मेयर से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे शाह के लिए सत्ता की शुरुआत काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है। दो-तिहाई बहुमत के बावजूद उनकी सरकार को सड़कों से लेकर प्रशासनिक केंद्र ‘सिंघा दरबार’ तक विरोध का सामना करना पड़ रहा है। जानकार के मुताबिक 6 माह का समय किसी भी सरकार के लिए हनीमून पीरिड होता हैं, लेकिन बोलेन के खिलाफ सड़कों पर उतरा यह जनसैलाब बताता हैं कि वे अपने किए गए वादों पर खरे उतरते नहीं दिख रहे है।
इस विरोध का सबसे बड़ा कारण भारत से आने वाले सामान पर लगाया गया नया अनिवार्य सीमा शुल्क है। नेपाल सरकार के फैसले के तहत 100 रुपये से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क लगाया जा रहा है, जिससे खासतौर पर सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग प्रभावित हुए हैं। इन इलाकों के निवासी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं। इसके बाद यह नीति उनके लिए आर्थिक बोझ बन गई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार ने यह निर्णय लेते समय जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया है, जिससे आम जनता की परेशानियां बढ़ गई हैं।
दूसरा बड़ा मुद्दा छात्र संगठनों से जुड़ा है। बालेन शाह सरकार पर आरोप है कि उसने राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संघों को दरकिनार करने या कमजोर करने की कोशिश की है। इस कारण युवाओं में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार संवाद के बजाय दमनकारी रवैया अपना रही है। देशभर में स्कूल और कॉलेज के छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं, जिसमें हजारों की संख्या में छात्र शामिल हुए। कई जगहों पर छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म में तख्तियां लेकर नारेबाजी करते देखा गया, जो इस आंदोलन के व्यापक सामाजिक प्रभाव को दर्शाता है। विरोध का तीसरा बड़ा केंद्र गृह मंत्री सूडान गुरुंग के खिलाफ लगे आरोप हैं। उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने और संदिग्ध वित्तीय लेनदेन में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों का दावा है कि गुरुंग के कथित तौर पर ऐसे लोगों से संबंध रहे हैं जो वित्तीय अपराधों में संलिप्त रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों में इसतरह के दस्तावेजों का भी जिक्र किया गया है जो विवादास्पद निवेश और शेयरधारिता की ओर इशारा करते हैं। इन आरोपों के चलते उनके इस्तीफे की मांग तेज होती जा रही है और यह मुद्दा आंदोलन का प्रमुख हिस्सा बन गया है।
इन सभी कारणों से बालेन शाह सरकार पर बहुआयामी दबाव बन गया है। आर्थिक नीतियों को लेकर असंतोष, छात्रों का उग्र विरोध और सरकार के भीतर कथित भ्रष्टाचार के आरोप—इन सबने मिलकर स्थिति को गंभीर बना दिया है। जो विरोध शुरुआत में एक नीति के खिलाफ था, वह अब एक व्यापक राजनीतिक चुनौती का रूप ले चुका है। सड़कों पर बढ़ती भीड़ और लगातार हो रहे प्रदर्शनों से यह साफ है कि सरकार को जल्द ही ठोस कदम उठाना होगा।
बालेन शाह सरकार दबाव में
विरोध प्रदर्शन के पैमाने और तीव्रता में वृद्धि के साथ, बालेन शाह सरकार को कई मोर्चों पर प्रतिक्रिया देने के लिए बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है: आर्थिक नीति संबंधी चिंताएँ, छात्र अशांति, और इसके रैंकों के भीतर अनुचितता के आरोप। नीतिगत निर्णयों पर असंतोष के रूप में जो शुरू हुआ वह अब एक व्यापक राजनीतिक चुनौती में बदल गया है, सड़कों पर और नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में विरोध की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं।

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