US कोर्ट का बड़ा फैसला, Donald Trump की टैरिफ नीति पर रोक
वॉशिंगटन: अमेरिका की भू-राजनीति और वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों को एक बड़ा न्यायिक झटका लगा है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने ट्रंप सरकार द्वारा वैश्विक स्तर पर लागू किए गए 10 प्रतिशत के आयात शुल्क (टैरिफ) को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने का आदेश दिया है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि फरवरी 2026 में लागू किया गया यह टैरिफ 1974 के व्यापार अधिनियम की कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करता है, जिससे अमेरिकी बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक बार फिर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।
अदालती फैसले का आधार और कानूनी विसंगतियां
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने 2-1 के बहुमत से दिए गए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने 1974 के व्यापार कानून की धारा 122 का अनुचित इस्तेमाल किया है। ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया था कि यह कानून भुगतान संतुलन के घाटे को सुधारने और डॉलर की स्थिति मजबूत करने के लिए 150 दिनों तक शुल्क लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जिन व्यापारिक घाटों का हवाला दिया गया, उन्हें ठीक करने के लिए यह टैरिफ किसी भी तरह से उचित या कानूनी कदम नहीं था। यह फैसला उन 24 राज्यों और छोटे व्यापारियों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है जिन्होंने इस नीति को सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों को दरकिनार करने की कोशिश बताया था।
कुछ प्रमुख क्षेत्रों को फिलहाल राहत नहीं
भले ही अदालत ने 10 प्रतिशत के व्यापक आयात शुल्क को रद्द कर दिया है, लेकिन स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इन क्षेत्रों पर पहले से लागू टैरिफ प्रभावी रहेंगे क्योंकि वे इस विशेष कानूनी चुनौती या पिछले अदालती फैसलों के दायरे से बाहर हैं। इसका अर्थ यह है कि इन विशेष उद्योगों से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और कीमतों पर फिलहाल कोई नरमी आने की उम्मीद नहीं है।
भविष्य की कानूनी लड़ाई और व्यापारिक अनिश्चितता
फेडरल कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब गेंद अमेरिकी न्याय विभाग के पाले में है। ऐसी पूरी संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस फैसले को 'यूएस कोर्ट ऑफ अपील्स' में चुनौती देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ जारी तनाव और वैश्विक अस्थिरता के बीच इस तरह के कानूनी टकराव से अमेरिकी बाजारों में निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। फिलहाल, इस आदेश ने उन देशों और कंपनियों को थोड़ी राहत दी है जो अमेरिकी बाजार में अपने निर्यात को लेकर चिंतित थे, लेकिन अंतिम समाधान उच्च न्यायालय की अगली सुनवाई पर ही टिका है।

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