यूनिफॉर्म सिविल कोड का असर, लिव-इन रिलेशनशिप भी आएंगे कानूनी दायरे में
भोपाल। मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। यूसीसी को लेकर गठित हाई लेवल कमेटी ने सोमवार (22 जून) को विभिन्न सामाजिक वर्गों और आयोगों के साथ बैठक कर महत्वपूर्ण सुझाव मांगे। कमेटी के अध्यक्ष और उत्तराखंड के पूर्व सचिव शत्रुघ्न सिंह ने जानकारी दी है कि यूसीसी का फाइनल ड्राफ्ट अगले 8 से 10 दिनों के भीतर पूरी तरह तैयार हो जाएगा। संभावना जताई जा रही है कि राज्य सरकार इसे आगामी मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में पेश कर सकती है।
लिव-इन रिलेशनशिप के लिए 30 दिनों में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य
यूसीसी के तहत लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बेहद कड़े और स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जा रहे हैं। नए नियमों के अनुसार, यदि कोई जोड़ा लिव-इन में रहने का फैसला करता है, तो उन्हें 30 दिनों के भीतर इसका अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इस ड्राफ्ट में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों का विशेष ध्यान रखा गया है:
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भरण-पोषण का अधिकार: लिव-इन के दौरान किसी भी विवाद या अलगाव की स्थिति में महिला और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पुरुष की होगी।
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पैतृक संपत्ति में हक: लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को पूरी तरह से वैध माना जाएगा और उन्हें सामान्य बच्चों की तरह ही माता-पिता की विरासत और संपत्ति में कानूनी अधिकार मिलेगा।
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झूठे मामलों से राहत: इस कानूनी रजिस्ट्रेशन से पुरुषों को भी बड़ी राहत मिलेगी, क्योंकि लिव-इन टूटने के बाद 'शादी का झांसा देकर दुष्कर्म' के आरोप लगाने वाले मामलों में कमी आएगी।
हिंदू और मुस्लिम संगठनों ने किया विरोध
कमेटी द्वारा लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर तैयार किए गए इन कानूनी प्रावधानों पर विवाद भी शुरू हो गया है। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। हिंदू उत्सव समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी का कहना है कि लिव-इन जैसी व्यवस्था भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के खिलाफ है, इसलिए इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। दूसरी तरफ, मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी इस नए नियम को लेकर अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
आदिवासियों को छूट और विवाह की उम्र तय करने की मांग
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पहले ही साफ कर चुके हैं कि मध्य प्रदेश की जनजातीय (आदिवासी) आबादी को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाएगा ताकि उनकी पारंपरिक व्यवस्थाएं प्रभावित न हों। इस बीच, कमेटी को आदिवासी प्रतिनिधियों की ओर से एक महत्वपूर्ण सुझाव मिला है, जिसमें कहा गया है कि आदिवासी समाज में भी विवाह के लिए एक न्यूनतम उम्र सीमा कानूनी रूप से तय की जानी चाहिए। प्रतिनिधियों का मानना है कि इस कदम से समाज में होने वाले बाल विवाह की कुप्रथा को पूरी तरह से रोकने में मदद मिलेगी।

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